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कविता-धरती का स्वर्ग कश्मीर

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 क्या खूब है ये पंक्तियाँ ‘गर फिरदौस बर रुए ज़मीं अस्त; हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त’ पर्वतों की गोद में ये हसीन घाटियाँ , बर्फ का मुकुट और गगनचुम्बी डालियाँ । फूलों की बहार ख्वाबों का मंजर,   जन्नत की छांव और ये कश्मीर शहर । चश्मे शाही की जलधार , जैसे मन में बजाए सितार । झील के किनारे नावों की हलचल, जिसे देख मन जाए मचल-मचल । हर मोड़ पर बसी एक कहानी पुरानी, कश्मीर की सुंदरता में है मनमानी । बर्फ से ढकी मखमल सी घाटियाँ, बर्फीली चाँदनी ओढ़े ये वादियाँ । इस शहर की है एक अलौकिक छवि, बस जाए जैसे जीवन की गति । आंखों में चमक और मन में मुस्कान, पत्थरों से सजे यहाँ पुराने भवन महान । कश्मीर की रंगीनी और  कहवे की प्याली, हर फूल खिले यहां और मौसम है निराली । नीले आसमान में चाँद और तारे मुस्काते, धरती का स्वर्ग यहां हर गुल खिलखिलाते । कल-कल बहती नदी जैसे स्वप्नों का सिलसिला ,  यहाँ सूरज की किरणें बिखेरे अपना ही जलजला  हर दिल सजाए चाहत की साज, यहां की खूबसूरती में है एक राज । यह धरती का स्वर्ग प्रेम का संदेश , यहां पर जीवन है बहुत ही विशेष । -श्रीमती श्वेता सिंह

कुशन कशीदाकारी भरे - कविता

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  समय है कि काटे नही कटता , मन अब मेरा कहीं नही लगता। कुछ बरस पहले तक तो वक्त ही नहीं था अपने लिए , खिंच तान कर एक दिन कशीदाकारी भरे कुशन सिये।  यह खाओ , यह मत करो , ज्यादा टीवी मत देखो , सुबह जल्दी उठना है ,कोई वक्त पर क्यों नहीं सोता ? हर समय बच्चो पर चिल्लाती कि घर गंदा मत करो , हर चीज जगह पर रखो , इधर उधर  बिखरे कुशन देखकर मेरा पारा सातवें आसमान पर होता। पूरे दिन इकट्ठी करती रहती  इन्ही शिकायतों की पोथी , जिसे पति देव के सामने परोसकर ही थी सोती।  कुछ सालों में बच्चे अपनी पढाई और नौकरी में खोने लगे , अब ये भी ओफिस से आकर खाना खाकर जल्दी सोने लगे । बहुत समय बाद घर , घर लगने लगा था , क्योंकि अब सब मेरे हिसाब से चलने लगा था।  किटी पार्टी डाली,सोशल सर्कल बनाया , अब सहेलियों के बताए सीरियल मैं देखकर खुश होने लगी थी।  कुछ साल बीते इसी दिनचर्या में , अब मुझे अपनी जिन्दगी बहुत अच्छी लगने लगी थी । अब हर चीज जगह पर रहती थी , बच्चे अपना रूम खुद ही साफ करने लगे थे । अखबार के बिखरे पन्ने भी अब सलीके से ,अलमारी के एक कोने मे लगने लगे थे । अब घर में शोर नहीं ...

कहानी -सुखी जीवन का मंत्र

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  एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज सोने से पहले अपनी दिन भर की खुशियां और गम एक काग़ज़ पर लिख लिया करती थीं।  एक रात उसने लिखा कि मेरे पति ने कल पूरी रात जोरदार खर्राटे लिए। ये भगवान का शुक्र है क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है ...भले ही उसकी खर्राटो की आवाज़ मुझें सोने नहीं देते...। मैं खुश हूं कि मेरे बेटे ने आज सुबह इस बात पर झगड़ा किया कि रात भर मच्छर-खटमल सोने नहीं देते यानी वह रात घर पर गुज़रता है ,आवारागर्दी नहीं करता।  मैं खुश हूं कि इस महीने बिजली,गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का बहुत ज्यादा बिल आया ,यानी ये सब चीजें मेरे पास,मेरे इस्तेमाल में हैं... अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती...?  दिन ख़त्म होने तक आज मेरा थकान से बुरा हाल हो गया। पर में खुश हूँ कि मेरे अंदर दिनभर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत ऊपरवाले के आशीर्वाद से है।  मैं खुश हूं कि हर रोज की तरह आज फिर अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ा। शुक्र है मेरे पास घर तो है ना... जिनके पास छत नहीं उनका क्या हाल होता होगा...? मैं खुश हूं कि इस साल दिवाली पर उपहार देने में पर्स ख़ाली हो गया........

ये बेरहम धुआं | hindi poem on side effects of smoking

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  जिंदगी की जद्दोजहद में , फिर कोई उलझा सा है । केकड़े के पंजों में फिर एक , हौसला जकड़ा सा है । एक सिगरेट से निकलता हुआ धुआं, फिर पूरे परिवार को राख कर गया । ये बेरहम नशा एक बार फिर , अपनों की ही जिंदगी ख़ाक कर गया । एहसास ही नहीं था कि यह रोग नहीं महामारी है । आज पाया कि मौत अब  जिंदगी पर भारी है। सोचता है कि कैसे अतीत में जा कर, नशे से नाता तोड़ दूं । आज मैं अपने बच्चों के सभी , टूटे सपनों को वापस जोड़ दूं । धुएं के कश में क्यों मैंने, बच्चों का भविष्य उड़ाया । क्यों नहीं वह पल मैंने , अपने अपनों के साथ बिताया । पेट में है भूख , है हाथ में रोटी, पर आज मुंह नहीं है चबाने के लिए । दिन रात सोचता रहता है तरीके, मौत को दूर भगाने के लिए । परिवार के साथ से जिंदगी की उम्मीद तो बढ़ रही है, एक बस एक और कोशिश  कहते-कहते छोटी सी चींटी पहाड़ चढ़ रही है । पर ऐसी बेरहम है ये बीमारी मेरे दोस्तों , कि आज मौत जिंदगी पर भारी पड़ रही है।  जिंदगी दिन पर दिन, और बेरहम होती जाएगी । मौत ही इस दर्द से अब , इसको मुक्ति दिलाएगी । कमजोर हो गया है , आजकल कम खाता- पीता है  ।  पर मौत ...

Mera ghar hindi story | हिंदी कहानी मेरा घर

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 " चीकू , जल्दी उठो ! 7:00 बज रहे हैं , स्कूल के लिए लेट हो जाओगे , स्कूल बस भी निकल जाएगी " हेमा चिल्लाई । जबरदस्ती आंखों को खोलने की कोशिश करते हुए चीकू ने कहा " आपने आज फिर मुझे लेट उठाया है ।"  " ज्यादा मत बोलो ! चुपचाप तैयार हो जाओ । आज अलार्म नहीं बजा । " बोलते हुए हेमा कमरे से बाहर निकल गई । आज फिर हर रोज की तरह हेमा अलार्म बंद करके दोबारा सो गई थी । 7:00 बजे आंख खुली। 7:30 चीकू की स्कूल बस आती है और 8:00 बजे उसे भी ऑफिस के लिए तैयार होकर निकलना है । बेडरूम में घुसी तो देखा कि राहुल अभी तक बिस्तर पर ही सुबह की चाय का इंतजार कर रहा था। " अरे !  एक दिन क्या आप अपने लिए चाय खुद नहीं बना सकते ?  लेट हो जाएंगे तो मुझे ही दोष देंगे । " " हेमा , तुम्हारा तो यह रोज का काम हो गया है । तुम रोज लेट क्यों उठती हो ? " राहुल ने गुस्से से कहा । " मैं भी इंसान हूं , मुझे भी आराम का हक है । डिनर करते- करते ग्यारह बज जाते है । अगर मैं रात को लेट सोऊंगी तो , सुबह जल्दी कैसे उठ पाऊंगी ? " "  इस घर में तो एक  कप चाय भी सुकून की नहीं मि...

हिंदी कविता महंगाई डायन खाय जात है | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग | hindi poem on inflation

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एक तरफ बढ़ती हुई महंगाई और बेकारी ,दूसरी तरफ आम इंसान की हर रोज की जरूरतें । इन दोनों के बीच में पिसते हुए आम इंसान की हालत का अंदाजा क्या वे लोग कभी लगा पाएंगे, जो सालों से यह दावा करते आ रहे हैं के वे महंगाई को घटा देंगे? क्या इंसान हर दौर में इसी तरह महंगाई से लड़ता और जूझता रहेगा ? यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है।  महंगाई डायन खाय जात है  अखबारों ने कीमतों की नई फेहरिस्त लगाई है, गृहस्ती महंगाई का फिर से रोना रोकर आई है।  आंखें नम ,जेबे खाली, तबीयत कुछ घबराई है, महंगाई इतनी बढ़ी , खुद महंगाई शरमाई है।  तेल भराने गए कार में, सोच रहे हैं खड़े-खड़े, यह कार की तेल भराई है या जेब की शामत आई है।  महंगाई से लड़ने में ताकत तो खूब लगाई है, बेकारी का हमला ऐसा, थोड़ी बहुत कमाई है।  रोटी का निवाला मुंह तक आते आते ठहर गया, भूखे पेट ख्याल आया, क्या बच्चों ने रोटी खाई है।  जमीन से ज़मीर तक सब कुछ तो बिकता है यहां, वाह रे कलयुग, आत्मा बिकने की नौबत आई है।  कोशिश है गरीबों को गरीबी रास आने लगे, असल तो महंगाई ही इस दौर की सच्च...

ना मिलने से | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

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 यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है।  कोई ना बच पाया , कोई कमी ना मिलने से।  कहीं पर आसमान तो,  कहीं जमीन न मिलने से।  आती-जाती सांस बन कर,  रह गए कुछ लोग।  वे तो जी ही नहीं पाए,  जिंदगी ना मिलने से।  अंगूठा चूसता बच्चा देखकर , सोचती है मां।  यह कैसे जिंदा बच पाएगा ,  रोटी ना मिलने से।  कब तक बची रहती,  आखिर लुट ही गई इज्जत।  कलाई को राखी,  सर को ओढनी ना मिलने से।  लड़कियों को कोख में , फना करते हुए सोचा।  कितने लड़के कुंवारे हैं,  एक लड़की ना मिलने से।  वादे तो सुने होंगे ,  सियासत के हवाले से।  लगी पर हाथ मायूसी ,  नौकरी ना मिलने से।  अंधेरों के हवाले जिंदगी ,  करता नहीं कोई।  बहुत मायूस है कुछ लोग ,  रौशनी ना मिलने से।  ये भी पढ़े : बोलना चाहती हूं मैं | Hindi poem on women CLICK HERE होली के रंग CLICK HERE काफ़िला साथ ,सफर तन्हा  CLICK HERE

देखा है | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

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  यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है।  जिन आंखों ने आती-जाती,  हरियाली को देखा है।  उन आंखों ने अब के कैसी ,  बदहाली को देखा है।  एक दिहाड़ी के पैसों में , बिकते देखी एक इज्जत।  भूखे पेट के आगे एक,  खाली थाली को देखा है।  खून और पानी का अंतर , अब के कोई बताए तो।  खून के आंसू रोती,  आंखों की लाली को देखा है।  जिन बाजारों ने अक्सर तो,  रौनक मेले देखे थे।  उन बाजारों में पसरी , उस कंगाली को देखा है।  आंसू की उन बूंदों से तो,  सातों सागर हारे हैं।  पत्ते पत्ते पर रोती , डाली डाली को देखा है।  कहां देख पाएगा वह,  यह खूनी होली का मंजर।  जिसने हरदम जगमग जगमग , दिवाली को देखा है।  ये भी पढ़े : बोलना चाहती हूं मैं | Hindi poem on women CLICK HERE होली के रंग CLICK HERE काफ़िला साथ ,सफर तन्हा  CLICK HERE

काफिला साथ, सफर तनहा | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

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  यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है :    हम भी तो हैं , एक लाल ढोल में पड़ी हुई , उन असंख्य चिट्ठियों की तरह , जो अलग-अलग जज्बात , अपने में समेटे हुए , एक साथ सफर करती हैं।  सबकी मंजिलें अलग-अलग , फिर भी एक राह पर,  साथ साथ वक्त बसर करती हैं।  कितनी खुशियां और गम , खुद में समेटे हुए  ये चिट्टियां , साथ होकर भी  बिल्कुल अकेली हैं।  इन्हीं चिट्ठियों की तरह कई जिंदगियां , मन में कई जज्बात लिए , एक साथ सफर पर निकलती हैं, कुछ दूर तक साथ चलती हैं।  आखिर इन चिट्ठियों की ही तरह , ये जिंदगियां एक साथ होकर भी , कितनी अकेली हैं।  डाकिए ने हमें एक साथ , एक राह पर उतारा है।  हम साथ रहे ना रहे , यह फैसला हमारा है।    ये भी पढ़े : बोलना चाहती हूं मैं | Hindi poem on women CLICK HERE होली के रंग CLICK HERE ना मिलने से CLICK HERE देखा है CLICK HERE

बोलना चाहती हूं मैं | Hindi poem on women | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

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  यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है :  नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं।  अधरों पर है प्रेम की भाषा , जीने की है तीर्व अभिलाषा।  फिर भी मन को क्यों है घेरे ? घोर अंधेरा , घोर निराशा।  कचोटता रहता है मन को, प्रेम का एहसास जरा सा।  कुछ है उगला जाने को आतुर , कंठ में है जो रूंधा हुआ सा।  एक तरफ है सारा जीवन , एक आजादी का बोध जरा सा।  दोनों को तराजू में रख कर , तोलना चाहती हूं मैं।  नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं।  यह सामाजिक ताना-बाना , मुझे सिखाया सदा निभाना।  कभी पुष्प खिलने से पहले , कलियों का वह कुचला जाना।  कभी पड़ा जीवन पर भारी , एक रात का साथ निभाना।  कभी किसी सामान की भांति , बाजारों में बिकते जाना।  चौसर के दाव लगे मुझ पर , पङा आग से होकर जाना।  खुद पर पड़ी इन बेड़ियों को , खोलना चाहती हूं मैं।  नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं।  कवि : डा. विकास बुधवार 

होली के रंग | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

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 यहां कवि श्री विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है  :    फागुन में छोरी चली ,     संग लेकर रंग-गुलाल।  भरी जवानी,छेडेंगे सब,     रखियो बहुत संभाल।    क्या मारी पिचकारी उसने,     भीगी चनिया - चोली। होली का रंग ऐसा चढ़ा ,    वह तो उसकी होली। रंग होली का ऐसा रचा,   वह जयों-जयों धोवे गाल। कुछ सर्दी से, कुछ शर्म से ,   तयों-तयों होंवें लाल। रंग और भंग ने मिलकर,   कैसा किया कमाल।  देवर भाभी ,जीजा साली ,   खेले स॔ग गुलाल। कहीं बिखरती हंसी ठिठोली ,     कहीं बटे पकवान।  रंगो के त्योहार का सब जन ,   संग करें गुणगान।  आपस में यूं गले मिले,     भुला दिए सब बैर।                 एक ही रंग में सभी रंगे,    कोई नहीं अब गैर। गुब्बारे ,  पिचकारिया  और   होली का हुड़दंग। गुजिया और मिष्ठान के,    संग रंग और भंग। होली में हो जन-जन के,   जीवन में उल्...

when lockdown changed one's life - story

When lockdown changed one's life  Every housewife thinks that she is  doing the most important job of world, taking care of her children and running a home .No doubt ,this job takes an awful lot of time and efforts . This job provides no time to pursue any outside interest. But, raising a f amily is n't a life time job and after the mother is finished raising her family, can't run out of reasons for existence.Otherwise She ais likely to become a burden to her child and family......ISN"T IT ? Himani was my classmate .We did Bechlore degree in Human psychology together .She was socially active ,dedicated stay  home mother of two kids . During lockdown, when Himani suddenly faced problem of getting things done herself ,she began to make more efficient use of her time . She realised, that earlier she used to spend a lot of time fussing around with little things that are not important at all and there is no harm in her beginning to think what her main interes...

my next door neighbour-story

MY NEXT DOOR NEIGHBOUR On sunday , I heard some turbulance in the balcony of adjecent flat  . Kartik ,owner of this flat is a forced bachelore . His wife , Sunaina stays in Banglore . I came out ant found Sunaina dusting the balcony windows. It was a pleasant surprise . She told me that she is enjoying herself immensely at her new job as advertising manager and she is satisfied with the amount of money she is making . But ,when I asked her about her family life ,there was an embarrassing silence.She told "I guess there is the one weak spot . In pursuing my carrier I seem to have lost touch with my husband .I am turning 36 next week .There is a huge pressure from my mother in law to plan family .Plus , I have got PCOD due to wrong eating habbits and long working hours .I , actually collapsed on the job one day and landed in a hospital"  . We discussed this situation for a while .I felt pity for this young ,professional girl who neglected her family and endangered her hea...

My friend Lakshmi- lockdown story

MY FRIEND LAKSHMI  Minister Narendra Modi    urged people across India to switch off their lights and hold candles , lamps and mobile flashlights at 9 pm on Sunday, April 5, for 9 minutes in a nationwide show of solidarity, to fight the darkness of coronavirus. As the clock struck 9 pm, lights went out in most houses and we gathered in our respective balconies, flashing mobile lights while a few of them lit candles and diyas  .On the second floor of c-Block,I could see a face much brighter than the diya in her hands . It was Lakshmi, my friend. Lakshmi was working in a real estate firm. She left her job when  her daughter was born.Sometimes,she used to get "bored" just running a home .  She always wanted to contribute to the earnings of her family. I remember ,once she told me that "I 'd be proud to teach English in any reputed school and my family would be proud of me too ".  Luckily , she had no health issue also . So , when her baby ...

sharma uncle from E- Block story

Sharma uncle from E-Block Around two years back ,our neighbour ,uncle Sharma from E-Block,came to have a cup of tea with my father in law .While serving the tea,I took one look at the tight grim expression around his lips and I could see that he was seriously concerned about something. He said "The Government says that sixty is the right age for retirement .It's all kind of crazy,if you ask me . I'll be sixty three in June and I am not old. I am still good in accounts . I am tired of playing golf , and my efforts at 'social work ' no longer keep me keen and interested. I wish to work again . But who is going to hire a sixty three years old ? " Uncle Sharma got full possession of his time ,with nothing to do with it .He was tired of playing golf,drinking , talking too much about the things he used to do in good old days .He used to miss the income , prestige and the admiration others ,which goes with an important position . We all know that ,b...

Lockdown story / I found my aim of life during lockdown

I discovered 'what I want out of life '  I am a very socially active , full time stay home mother of two teen age kids ,who was doing the most important job of world, taking care of my children and running a home .No doubt ,this job takes an awful lot of time and efforts . I used to consider myself 'The busiest housewife'who had no time to pursue any outside interest. But,during lockdown, when I suddenly faced problem of getting things done myself ,I began to make more efficient use of my time . I realised, that earlier I used to spend a lot of time fussing around with little things that are not important at all and there is no harm in me beginning to think what my main interest's going to be after my children are raised and are able to take care of themselves. After all, raising a family is n't a life time job and after the mother is finished raising her family, can't run out of reasons for existence.Otherwise you are likely to become a burd...

Funny impacts of lockdown on women in India

Impact of lockdown at family level Husbands are working from home.Malls and movie halls are closed.No outside food.  All families , in different societies don't  have  domestic helps for some days ,since they may also be working from home. Few mothers are suffering badly of momorona virus.This Virus is affecting mothers with kids staying longer at home and are not allowed outside.Symptoms are  high BP, frequent unnecessary screaming, headaches, blasting husbands for not sharing responsibility, real lack of sleep, overall crazy feeling.  This is more viral than Corona.  I  wish strength to all such women to deal with this sudden calamity. But , I am lucky since I have a family with better understanding . Kids are wearing smaller clothes, and lighter material clothes like Shorts,T shirts , Tracks... so that I can put the washing machine on alternate days.  All family members are doing their stuff in living room, of course distantly,...

nukkad natak on panch tatva aur nari

NUKKAD NATAK ( FIVE ELEMENTS AUR NARI ) सभी (तालियों के  साथ  ) - आग  ,हवा  ,पानी , धरती  और आकाश | नारी  के हर रुप में होता,  है  इनका  आभास | आग  ,हवा  ,पानी , धरती  और आकाश | नारी  के हर रुप में होता,  है  इनका  आभास | 1:स्वागत है आपका माँ सरस्वती के  देश  में  ,जहा  बेटी  को  किताबों  से  दूर  रखा   जाता  है। 2 :स्वागतहै आपका माँ लक्ष्मी  के  देश  में  , जहा लक्ष्मी  के  चेहरे  पर  तेजाब  फेंका  जाता  है। 3 :स्वागतहै आपका माँ सीता   के  देश  में  , जहा सीता   को  हर रोज  अग्निपरिक्षा  देनी  पडती  है | 4 :स्वागतहै आपका माँ काली    के  देश  में  , जहा काली    को  उसकी शक्ति से नही  रंग  से  पेहचाना  जाता    है | 5:स्वागत है आपका माता  स...

पंच तत्व और नारी hindi poem on panch tatva aur nari

       पंच-तत्व और  नारी   नारी  तू  है , एक  अदभुत माया | ज़िसे प्रकृति  ने  , पंच-तत्वो से  बनाया | हवा  ,पानी  ,अग्नि, धरती और  आकाश | नारी  के  व्यक्तित्व में  होता , है  इनका  अभास | तेरा  प्रेम है  पानी  सा  , निश्छल और  गहरा | तेरी  सोच मानो बहती पवन , जिस  पर  डाल  न  सके  कोई  पहरा | ममत्व ,समर्पण ,सहनशीलता व  त्याग  का  अहसास | हे  नारी  ! तुझमे बसता  है , ये पृथ्वी-तत्व खास | सूर्य  के  समान  तेज  है  तेरा  , तू  ही  तो  जीवनदाता है | हर  मुश्किल को  पिघलाने वाला , अग्नि-तत्व तुझमें साफ  नजर  आता है | कभी  इतराकर , कभी  इठलाकर, जब  आसमान में तू  उडती है | तब  अपने, मूल- तत्व आकाश  से , जा जुडती है |

हिंदी कविता : हमारी वाटिका

   हमारी ये वाटिका है , पंच तत्वों का मेल । जल की नन्ही - नन्ही बूंदे  रच  रही , इसके फव्वारों  में  खेल  | चहकती चिडियों  से  भरा  है, इसका  ये नीला  आकाश  । सुर्य भी  लूटा  रहा , हम सब  पर अपना प्रकाश  | चल  रही  ठंठी हवा , हरी पत्तियों  को जगाने लगी  | घरती की  कोख  में  कोमल घास भी , जैसे  कोई  गीत  गाने  लगी  |