ये बेरहम धुआं | hindi poem on side effects of smoking

 

जिंदगी की जद्दोजहद में ,

फिर कोई उलझा सा है ।

केकड़े के पंजों में फिर एक ,

हौसला जकड़ा सा है ।


एक सिगरेट से निकलता हुआ धुआं,

फिर पूरे परिवार को राख कर गया ।

ये बेरहम नशा एक बार फिर ,

अपनों की ही जिंदगी ख़ाक कर गया ।


एहसास ही नहीं था कि

यह रोग नहीं महामारी है ।

आज पाया कि मौत अब 

जिंदगी पर भारी है।


सोचता है कि कैसे अतीत में जा कर,

नशे से नाता तोड़ दूं ।

आज मैं अपने बच्चों के सभी ,

टूटे सपनों को वापस जोड़ दूं ।


धुएं के कश में क्यों मैंने,

बच्चों का भविष्य उड़ाया ।

क्यों नहीं वह पल मैंने ,

अपने अपनों के साथ बिताया ।


पेट में है भूख , है हाथ में रोटी,

पर आज मुंह नहीं है चबाने के लिए ।

दिन रात सोचता रहता है तरीके,

मौत को दूर भगाने के लिए ।


परिवार के साथ से जिंदगी की उम्मीद तो बढ़ रही है,

एक बस एक और कोशिश  कहते-कहते छोटी सी चींटी पहाड़ चढ़ रही है ।

पर ऐसी बेरहम है ये बीमारी मेरे दोस्तों ,

कि आज मौत जिंदगी पर भारी पड़ रही है। 


जिंदगी दिन पर दिन,

और बेरहम होती जाएगी ।

मौत ही इस दर्द से अब ,

इसको मुक्ति दिलाएगी ।


कमजोर हो गया है ,

आजकल कम खाता- पीता है  । 

पर मौत को चिड़ाते हुए ,

यह एक पल में सदियां जीता है ।


मरेंगे शान से ए मौत ,

तेरे सामने गिड़गिड़ाएंगे नहीं ।

तू करले कितने भी सितम ,

इसकी कोशिशों  के कदम लड़खड़ाएंगे नहीं ।


खुद को समझाने लगा है कि,

अंत समय तो सभी का आता है ।

ये बीमारी तो एक बहाना है बंदे ,

खुदा के घर तो हर कोई जाता है । 


वक्त है कम तो पल में ,

सदिया जीने का हौसला रख लिया ।

जिंदगी का हाथ छोड़कर ,

मौत के दामन में सर रख दिया ।


जिंदगी जीने का हुनर , 

मौत के करीब आया ।

मौत से लड़ने का कोई तरीका ,

जिंदगी बचा न पाया ।


सब्र का इम्तिहान लेती हैं ,

अपनों को भी तोड़ देती है यह परेशानी ।

दिल और दिमाग में चलती जद्दोजहद ,

पीढ़ियों पर छोड़ देती है अपनी निशानी ।


वो बच्चा डरता है आज ,

उस नशे के जहर से ।

दरअसल , पिताजी तड़प के मरे थे ,

केकड़े के कहर से ।


रात कितनी भी काली हो ,

सवेरा जरूर आता है 

बाप ने हारी थी जो लड़ाई ,

बेटा उसी में पदक पाता है ।

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