ना मिलने से | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

 यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है। 


कोई ना बच पाया ,

कोई कमी ना मिलने से। 

कहीं पर आसमान तो,

 कहीं जमीन न मिलने से। 


आती-जाती सांस बन कर,

 रह गए कुछ लोग। 

वे तो जी ही नहीं पाए,

 जिंदगी ना मिलने से। 


अंगूठा चूसता बच्चा देखकर ,

सोचती है मां। 

यह कैसे जिंदा बच पाएगा ,

 रोटी ना मिलने से। 


कब तक बची रहती, 

आखिर लुट ही गई इज्जत। 

कलाई को राखी, 

सर को ओढनी ना मिलने से। 


लड़कियों को कोख में ,

फना करते हुए सोचा। 

कितने लड़के कुंवारे हैं, 

एक लड़की ना मिलने से। 


वादे तो सुने होंगे ,

 सियासत के हवाले से। 

लगी पर हाथ मायूसी ,

 नौकरी ना मिलने से। 


अंधेरों के हवाले जिंदगी ,

 करता नहीं कोई। 

बहुत मायूस है कुछ लोग ,

 रौशनी ना मिलने से। 

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