बोलना चाहती हूं मैं | Hindi poem on women | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

 यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है : 

नारी हूं ,

नारी के अस्तित्व के लिए,

बोलना चाहती हूं मैं। 


अधरों पर है प्रेम की भाषा ,

जीने की है तीर्व अभिलाषा। 

फिर भी मन को क्यों है घेरे ?

घोर अंधेरा , घोर निराशा। 


कचोटता रहता है मन को,

प्रेम का एहसास जरा सा। 

कुछ है उगला जाने को आतुर ,

कंठ में है जो रूंधा हुआ सा। 


एक तरफ है सारा जीवन ,

एक आजादी का बोध जरा सा। 

दोनों को तराजू में रख कर ,

तोलना चाहती हूं मैं। 

नारी हूं ,

नारी के अस्तित्व के लिए,

बोलना चाहती हूं मैं। 

यह सामाजिक ताना-बाना ,

मुझे सिखाया सदा निभाना। 

कभी पुष्प खिलने से पहले ,

कलियों का वह कुचला जाना। 


कभी पड़ा जीवन पर भारी ,

एक रात का साथ निभाना। 

कभी किसी सामान की भांति ,

बाजारों में बिकते जाना। 


चौसर के दाव लगे मुझ पर ,

पङा आग से होकर जाना। 

खुद पर पड़ी इन बेड़ियों को ,

खोलना चाहती हूं मैं। 

नारी हूं ,

नारी के अस्तित्व के लिए,

बोलना चाहती हूं मैं। 

कवि : डा. विकास बुधवार 

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