हिंदी कविता महंगाई डायन खाय जात है | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग | hindi poem on inflation

एक तरफ बढ़ती हुई महंगाई और बेकारी ,दूसरी तरफ आम इंसान की हर रोज की जरूरतें । इन दोनों के बीच में पिसते हुए आम इंसान की हालत का अंदाजा क्या वे लोग कभी लगा पाएंगे, जो सालों से यह दावा करते आ रहे हैं के वे महंगाई को घटा देंगे?

क्या इंसान हर दौर में इसी तरह महंगाई से लड़ता और जूझता रहेगा ?

यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है। 

महंगाई डायन खाय जात है 

अखबारों ने कीमतों की नई फेहरिस्त लगाई है,

गृहस्ती महंगाई का फिर से रोना रोकर आई है। 


आंखें नम ,जेबे खाली, तबीयत कुछ घबराई है,

महंगाई इतनी बढ़ी , खुद महंगाई शरमाई है। 


तेल भराने गए कार में, सोच रहे हैं खड़े-खड़े,

यह कार की तेल भराई है या जेब की शामत आई है। 


महंगाई से लड़ने में ताकत तो खूब लगाई है,

बेकारी का हमला ऐसा, थोड़ी बहुत कमाई है। 


रोटी का निवाला मुंह तक आते आते ठहर गया,

भूखे पेट ख्याल आया, क्या बच्चों ने रोटी खाई है। 


जमीन से ज़मीर तक सब कुछ तो बिकता है यहां,

वाह रे कलयुग, आत्मा बिकने की नौबत आई है। 


कोशिश है गरीबों को गरीबी रास आने लगे,

असल तो महंगाई ही इस दौर की सच्चाई है। 


आवाजें आने लगी है मंचो और सभाओं से,

इस बढ़ती महंगाई की एक भाषण ही भरपाई है। 

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