देखा है | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

 यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी कविता प्रस्तुत की जा रही है। 


जिन आंखों ने आती-जाती,

 हरियाली को देखा है। 

उन आंखों ने अब के कैसी ,

 बदहाली को देखा है। 


एक दिहाड़ी के पैसों में ,

बिकते देखी एक इज्जत। 

भूखे पेट के आगे एक,

 खाली थाली को देखा है। 


खून और पानी का अंतर ,

अब के कोई बताए तो। 

खून के आंसू रोती,

 आंखों की लाली को देखा है। 


जिन बाजारों ने अक्सर तो,

 रौनक मेले देखे थे। 

उन बाजारों में पसरी ,

उस कंगाली को देखा है। 


आंसू की उन बूंदों से तो,

 सातों सागर हारे हैं। 

पत्ते पत्ते पर रोती ,

डाली डाली को देखा है। 


कहां देख पाएगा वह,

 यह खूनी होली का मंजर। 

जिसने हरदम जगमग जगमग ,

दिवाली को देखा है। 


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