जिंदगी की जद्दोजहद में , फिर कोई उलझा सा है । केकड़े के पंजों में फिर एक , हौसला जकड़ा सा है । एक सिगरेट से निकलता हुआ धुआं, फिर पूरे परिवार को राख कर गया । ये बेरहम नशा एक बार फिर , अपनों की ही जिंदगी ख़ाक कर गया । एहसास ही नहीं था कि यह रोग नहीं महामारी है । आज पाया कि मौत अब जिंदगी पर भारी है। सोचता है कि कैसे अतीत में जा कर, नशे से नाता तोड़ दूं । आज मैं अपने बच्चों के सभी , टूटे सपनों को वापस जोड़ दूं । धुएं के कश में क्यों मैंने, बच्चों का भविष्य उड़ाया । क्यों नहीं वह पल मैंने , अपने अपनों के साथ बिताया । पेट में है भूख , है हाथ में रोटी, पर आज मुंह नहीं है चबाने के लिए । दिन रात सोचता रहता है तरीके, मौत को दूर भगाने के लिए । परिवार के साथ से जिंदगी की उम्मीद तो बढ़ रही है, एक बस एक और कोशिश कहते-कहते छोटी सी चींटी पहाड़ चढ़ रही है । पर ऐसी बेरहम है ये बीमारी मेरे दोस्तों , कि आज मौत जिंदगी पर भारी पड़ रही है। जिंदगी दिन पर दिन, और बेरहम होती जाएगी । मौत ही इस दर्द से अब , इसको मुक्ति दिलाएगी । कमजोर हो गया है , आजकल कम खाता- पीता है । पर मौत ...
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