यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है : नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं। अधरों पर है प्रेम की भाषा , जीने की है तीर्व अभिलाषा। फिर भी मन को क्यों है घेरे ? घोर अंधेरा , घोर निराशा। कचोटता रहता है मन को, प्रेम का एहसास जरा सा। कुछ है उगला जाने को आतुर , कंठ में है जो रूंधा हुआ सा। एक तरफ है सारा जीवन , एक आजादी का बोध जरा सा। दोनों को तराजू में रख कर , तोलना चाहती हूं मैं। नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं। यह सामाजिक ताना-बाना , मुझे सिखाया सदा निभाना। कभी पुष्प खिलने से पहले , कलियों का वह कुचला जाना। कभी पड़ा जीवन पर भारी , एक रात का साथ निभाना। कभी किसी सामान की भांति , बाजारों में बिकते जाना। चौसर के दाव लगे मुझ पर , पङा आग से होकर जाना। खुद पर पड़ी इन बेड़ियों को , खोलना चाहती हूं मैं। नारी हूं , नारी के अस्तित्व के लिए, बोलना चाहती हूं मैं। कवि : डा. विकास बुधवार