कुशन कशीदाकारी भरे - कविता
समय है कि काटे नही कटता , मन अब मेरा कहीं नही लगता। कुछ बरस पहले तक तो वक्त ही नहीं था अपने लिए , खिंच तान कर एक दिन कशीदाकारी भरे कुशन सिये। यह खाओ , यह मत करो , ज्यादा टीवी मत देखो , सुबह जल्दी उठना है ,कोई वक्त पर क्यों नहीं सोता ? हर समय बच्चो पर चिल्लाती कि घर गंदा मत करो , हर चीज जगह पर रखो , इधर उधर बिखरे कुशन देखकर मेरा पारा सातवें आसमान पर होता। पूरे दिन इकट्ठी करती रहती इन्ही शिकायतों की पोथी , जिसे पति देव के सामने परोसकर ही थी सोती। कुछ सालों में बच्चे अपनी पढाई और नौकरी में खोने लगे , अब ये भी ओफिस से आकर खाना खाकर जल्दी सोने लगे । बहुत समय बाद घर , घर लगने लगा था , क्योंकि अब सब मेरे हिसाब से चलने लगा था। किटी पार्टी डाली,सोशल सर्कल बनाया , अब सहेलियों के बताए सीरियल मैं देखकर खुश होने लगी थी। कुछ साल बीते इसी दिनचर्या में , अब मुझे अपनी जिन्दगी बहुत अच्छी लगने लगी थी । अब हर चीज जगह पर रहती थी , बच्चे अपना रूम खुद ही साफ करने लगे थे । अखबार के बिखरे पन्ने भी अब सलीके से ,अलमारी के एक कोने मे लगने लगे थे । अब घर में शोर नहीं ...