काफिला साथ, सफर तनहा | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग

 

यहां डा. विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है : 

 


हम भी तो हैं ,

एक लाल ढोल में पड़ी हुई ,

उन असंख्य चिट्ठियों की तरह ,

जो अलग-अलग जज्बात ,

अपने में समेटे हुए ,

एक साथ सफर करती हैं। 

सबकी मंजिलें अलग-अलग ,

फिर भी एक राह पर, 

साथ साथ वक्त बसर करती हैं। 

कितनी खुशियां और गम ,

खुद में समेटे हुए 

ये चिट्टियां ,

साथ होकर भी 

बिल्कुल अकेली हैं। 


इन्हीं चिट्ठियों की तरह

कई जिंदगियां ,

मन में कई जज्बात लिए ,

एक साथ सफर पर निकलती हैं,

कुछ दूर तक साथ चलती हैं। 

आखिर इन चिट्ठियों की ही तरह ,

ये जिंदगियां एक साथ होकर भी ,

कितनी अकेली हैं। 


डाकिए ने हमें एक साथ ,

एक राह पर उतारा है। 

हम साथ रहे ना रहे ,

यह फैसला हमारा है। 

 

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