होली के रंग | काव्य के रंग डा. विकास बुधवार के संग
यहां कवि श्री विकास बुधवार द्वारा लिखी गयी कविता प्रस्तुत की जा रही है :
फागुन में छोरी चली ,
संग लेकर रंग-गुलाल।
भरी जवानी,छेडेंगे सब,
रखियो बहुत संभाल।
क्या मारी पिचकारी उसने,
भीगी चनिया - चोली।
होली का रंग ऐसा चढ़ा ,
वह तो उसकी होली।
रंग होली का ऐसा रचा,
वह जयों-जयों धोवे गाल।
कुछ सर्दी से, कुछ शर्म से ,
तयों-तयों होंवें लाल।
रंग और भंग ने मिलकर,
कैसा किया कमाल।
देवर भाभी ,जीजा साली ,
खेले स॔ग गुलाल।
कहीं बिखरती हंसी ठिठोली ,
कहीं बटे पकवान।
रंगो के त्योहार का सब जन ,
संग करें गुणगान।
आपस में यूं गले मिले,
भुला दिए सब बैर।
एक ही रंग में सभी रंगे,
कोई नहीं अब गैर।
गुब्बारे , पिचकारिया और
होली का हुड़दंग।
गुजिया और मिष्ठान के,
संग रंग और भंग।
होली में हो जन-जन के,
जीवन में उल्लास।
आपस के सब बैर मिटें,
जगे प्रेम की प्यास।
फागुन की ऋतु में ,
पिया की राह तके दिन रैन।
सपनों में जो तन मन भीगे,
कैसे आवे चैन।
फागुन की बिरहन के दिल में ,
हूक उठे दिन रात।
कैसे पहुंचे उनके दिल तक ,
अपने दिल की बात।
रंगों से रंग मिल जाए ,
दिल मिले दिलों के साथ।
होली के बहाने से कह ले ,
उससे मन की बात।
कवि : श्री विकास बुधवार
Nice
जवाब देंहटाएंAwesome sir👍
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